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सच्ची पूर्व जन्म की कहानी

आँखों की रोशनी चली गई, कर्ज़ का डर बना रहा: क्या पास्ट लाइफ रिग्रेशन में मिला इन सवालों का जवाब?

लेखक हिटेश छाबड़ा • पास्ट लाइफ रिग्रेशन विशेषज्ञ एवं मनोवैज्ञानिक

अनुमानित पढ़ने का समय 18 मिनट • सितम्बर 2026

काले चश्मे पहने एक व्यक्ति ब्रेल पुस्तक पढ़ रहा है; उसकी उँगलियों से सुनहरी रोशनी उठ रही है। चित्र पर लिखा है: आँखों की रोशनी गई, कर्ज़ का डर बना रहा, लेकिन ज्ञान ने उन्हें नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया।

वह डर जिसका कारण उन्हें कभी समझ नहीं आया

एक कठिन प्रतियोगी परीक्षा उत्तीर्ण करके उन्होंने भारत सरकार में वरिष्ठ अधिकारी का पद हासिल किया था। इस उपलब्धि के पीछे वर्षों की पढ़ाई, अनुशासन और दृढ़ संकल्प थे। लेकिन उनकी यात्रा में एक ऐसा मोड़ आया था जिसे सुनकर कोई भी ठिठक जाए: आठवीं कक्षा में उनकी आँखों की रोशनी चली गई थी।

उससे पहले वे देख सकते थे। स्कूल जाते हुए, अपने आसपास की दुनिया को जानते-समझते हुए उनका बचपन बीत रहा था। तभी उनकी एक आँख में संक्रमण हुआ और धीरे-धीरे उसकी रोशनी कम होने लगी। फिर समस्या दूसरी आँख तक पहुँच गई। एक समय ऐसा आया जब वे दोनों आँखों से देख नहीं पा रहे थे। बचपन से पहचाने हुए चेहरे, रास्ते और रोज़मर्रा के दृश्य अब पहले की तरह उनके सामने नहीं थे।

शुरुआत में इस घटना ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया। उम्र अभी बहुत कम थी और पूरी ज़िंदगी सामने पड़ी थी। जिस तरह से वे दुनिया को जानते थे, वह अचानक बदल गया था। कोई सफलता या आध्यात्मिक विचार उस क्षण इस नुकसान को छोटा नहीं बना सकता था। उन्हें पहले उस पीड़ा से गुज़रना पड़ा; उसके बाद ही वे सोच पाए कि आगे जीवन किस तरह जिया जाए।

धीरे-धीरे उनके भीतर एक विचार जन्म लेने लगा। अगर वे अपनी शारीरिक आँखों से नहीं देख सकते, तो क्या वे अपने भीतर देखने का कोई और तरीका विकसित कर सकते हैं? छोटी उम्र में ही वे योग, ध्यान और आध्यात्मिक अभ्यास की ओर मुड़े। वे उस तीसरे नेत्र को जागृत करने पर काम करने लगे जिसकी बात वे आज भी करते हैं। उनके अनुसार, इस आंतरिक जागरूकता ने उन्हें अपनी भावनाएँ समझने, आसपास की दुनिया को नए ढंग से अनुभव करने और फिर से आत्मविश्वास के साथ जीने में मदद की। हलाकि इससे आँखों की रोशनी खोने की वास्तविक पीड़ा तो नहीं मिटी। लेकिन जीवन को नए तरीके से जीने का मार्ग मिला व आत्मविश्वास जगा।

इसी आंतरिक शक्ति के सहारे उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। वे सरकारी अधिकारी बने, कविताएँ लिखीं और जूडो का अभ्यास किया। उन्होंने सत्रह से अधिक देशों की यात्राएँ कीं और अलग-अलग स्थानों तथा संस्कृतियों को जाना। उनकी शारीरिक दृष्टि चली गई थी, लेकिन सीखने, दुनिया को समझने और दूसरों के लिए कुछ करने की इच्छा जीवित रही।

फिर भी उनके आत्मविश्वास के पीछे एक डर हमेशा मौजूद था। बचपन से किसी का भी कुछ बकाया होना उन्हें गहराई से परेशान करता था। बात पैसों की हो सकती थी या किसी ऐसे एहसान की, जिसे वे लौटा न पाए हों। दूसरे के लिए मामूली-सी देनदारी भी उनके मन में अधूरे हिसाब की तरह अटक जाती। उन्हें डर लगता कि अगर वह हिसाब चुकाने से पहले कुछ हो गया, तो कोई बड़ी विपत्ति आ सकती है। वे इस दुनिया से जाते समय किसी के भी ऋणी नहीं रहना चाहते थे।

जिस व्यक्ति ने आँखों की रोशनी खोने के बाद अपना जीवन सँवारा, एक महत्वपूर्ण पद तक पहुँचा और दुनिया का अनुभव किया, वह एक छोटे-से कर्ज़ की कल्पना से इतना भयभीत क्यों था? बचपन की कोई घटना उन्हें इस डर का कारण नहीं बता पाती थी। यही सवाल लेकर वे हितेश छाबड़ा के पास पास्ट लाइफ रिग्रेशन सत्र के लिए आए थे। वे उस भय को समझना चाहते थे जिसे उनकी तमाम उपलब्धियाँ भी शांत नहीं कर पाई थीं।

खेत में प्रतीक्षा करती लड़की

खेत और प्रतीक्षा का सांकेतिक चित्र
कहानी से प्रेरित सांकेतिक चित्र; ऐतिहासिक प्रमाण नहीं।

पास्ट लाइफ रिग्रेशन में सामने आए पहले दृश्य में उन्हें एक विशाल खेत दिखाई दिया। मिट्टी जोती जा चुकी थी, लेकिन अभी उसमें बीज नहीं बोए गए थे। वे उस खेत में खड़ी लगभग सोलह से अठारह वर्ष की एक लड़की का जीवन अनुभव कर रहे थे। उसने गाँव की लंबी पोशाक पहनी थी और उसके पैरों में पायल थीं। वह गरीब परिवार से थी; जिस ज़मीन पर वह खड़ी थी, वह उसके परिवार की नहीं थी।

काफ़ी दूर खेत का मालिक उसकी ओर आ रहा था। उसे शायद यह पता भी नहीं था कि कोई उसे देख रहा है। लड़की का उस व्यक्ति से कोई झगड़ा नहीं था। उसने उसे कभी कोई नुकसान नहीं पहुँचाया था और लड़की के मन में भी उसके लिए कोई क्रोध नहीं था। फिर भी वह वहाँ से गई नहीं। वह खड़ी रही, मानो उसके और पास आने का इंतज़ार कर रही हो।

जैसे-जैसे दृश्य स्पष्ट हुआ, लड़की के हाथों में पकड़ी वस्तु भी सामने आई: एक भरी हुई दुनाली बंदूक। वह उस व्यक्ति को गोली मारने आई थी। वह ऐसा नहीं करना चाहती थी, लेकिन किसी मजबूरी के कारण उसे लगा कि यह काम करना ही पड़ेगा। उस व्यक्ति के करीब आते जाने के साथ उसका भीतरी संघर्ष बढ़ता गया। मन की एक आवाज़ उसे रुकने को कह रही थी; दूसरी कह रही थी कि अब वह पीछे नहीं हट सकती।

तब उसने एक ऐसा निर्णय लिया जिसमें उसकी दोनों इच्छाएँ झलकती थीं। वह गोली चलाएगी, लेकिन इतनी दूरी से कि एलजी कारतूस के छर्रे उस व्यक्ति तक पहुँचने से पहले फैल जाएँ। उसे उम्मीद थी कि शायद इस तरह उसकी जान बच जाएगी। उसने बंदूक उसके शरीर के ऊपरी हिस्से की ओर की और घोड़ा दबा दिया।

गोली उसे लगी। वह दर्द से चिल्लाया और ज़मीन पर गिर पड़ा। कुछ क्षण लड़की वहीं खड़ी देखती रह गई। उसे पता नहीं था कि वह व्यक्ति बचेगा या नहीं। बंदूक में एक और गोली थी। वह पास जाकर दोबारा गोली चला सकती थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। वह मुड़ी और भाग गई।

उस गोली के पीछे छिपा कर्ज़

पछतावे और देखभाल का सांकेतिक चित्र
कहानी से प्रेरित सांकेतिक चित्र; ऐतिहासिक प्रमाण नहीं।

लड़की गाँव लौटी और सीधे साहूकार के घर पहुँची। उसने उसके सामने बंदूक फेंक दी। साहूकार ने जो काम उससे करवाया था, वह कर चुकी थी। अब उसके पिता का कर्ज़ चुकता मान लिया जाए। लड़की ने कहा अब हमारा हिसाब बराबर।

तब समझ आया कि वह खेत में क्यों गई थी। उसके पिता पर साहूकार का भारी कर्ज़ था और इसकी वजह से गरीब परिवार लगातार परेशानियों में घिरा रहता था। घर में कोई भाई नहीं था। पिता को उस बोझ से मुक्त कराने के लिए लड़की ने कह दिया था कि वह जो कर सकेगी, करेगी। साहूकार का खेत के मालिक से ज़मीन को लेकर विवाद था। उसने लड़की से कहा था कि यदि वह उस व्यक्ति को गोली मार दे, तो परिवार का पूरा कर्ज़ माफ़ कर देगा। अपराध में उसका अपना नाम भी नहीं आएगा।

लड़की अपने पिता को बचाने की उम्मीद लेकर खेत गई थी। साहूकार के लिए अब हिसाब बंद हो गया था, लेकिन बंदूक की आवाज़ और उस आदमी को गिरते देखने का दृश्य लड़की के मन से नहीं निकल रहा था। भागने के बाद उसे पता भी नहीं था कि उसके साथ क्या हुआ। जब गाँव में गोली चलने की खबर फैली, तो वह एक चिंतित पड़ोसन बनकर घायल व्यक्ति के घर पहुँची। किसी को अंदाज़ा नहीं था कि गोली उसी ने चलाई थी।

फिर वह उसके सामने थी। छर्रे उसकी बाईं आँख के पास लगे थे और घाव में संक्रमण हो गया था। लड़की उस व्यक्ति के घर में खड़ी थी जो उसके किए हुए काम के कारण पीड़ा सह रहा था। वह सच बताना चाहती थी, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। वह बस उसके पास रहकर घाव को और बिगड़ते देख सकती थी।

जिस जीवन का वह अनुभव कर रही थी, उसमें घायल आँख के लिए प्रभावी उपचार उपलब्ध नहीं था। अगले कुछ हफ्तों में संक्रमण बढ़ा और दूसरी आँख की रोशनी भी कम होने लगी। आखिर वह व्यक्ति दोनों आँखों से देखना बंद कर चुका था। लड़की ने दूर से गोली इसलिए चलाई थी कि उसकी जान न जाए। उसने कभी नहीं सोचा था कि वह बच तो जाएगा, लेकिन हर दिन उस गोली के परिणाम के साथ जिएगा।

वह उसकी आँखों की रोशनी लौटा नहीं सकती थी। सच स्वीकार करने का साहस भी नहीं कर पा रही थी। लेकिन वह उसके साथ रहकर उसकी देखभाल कर सकती थी। अपने किए के प्रति जिम्मेदारी निभाने का यही एक रास्ता उसे दिखाई दिया। उस व्यक्ति की मृत्यु तक वह उसकी सेवा करती रही। उन सभी वर्षों में उसका अपराध और पछतावा उसके भीतर दबा रहा।

लेकिन इस त्रासदी की शुरुआत गोली चलने से भी पहले हो गई थी। पिता के कर्ज़ ने परिवार को साहूकार की मर्ज़ी पर निर्भर कर दिया था। उसी बेबसी का फायदा उठाकर उसने लड़की से एक निर्दोष व्यक्ति को नुकसान पहुँचाने की माँग की। लड़की को लगा कि पिता को बचाने का यही रास्ता है। अगर वह कर्ज़ न होता, तो वह हाथ में बंदूक लेकर उस खेत में खड़ी ही नहीं होती। इस जीवन से उभरने वाला डर यही था: बकाया कर्ज़ किसी दूसरे व्यक्ति को आपके फैसलों पर अधिकार दे सकता है और आपसे ऐसा काम करवा सकता है जिसका पछतावा जीवन भर रहे।

जब पहले जीवन की कड़ी समझ में आने लगी

लड़की के जीवन के दृश्य समाप्त हुए, लेकिन क्लाइंट अभी भी ट्रान्स में थे। पास्ट लाइफ रिग्रेशन सत्र के एक्सप्लोरेशन प्लेन उस अवस्था में जहाँ वे अपने अनुभव के बारे में बात कर सकते थे वहां उन्होंने उस जीवन और अपने वर्तमान जीवन के बीच संबंध देखना शुरू किया।

सबसे पहले बात आँखों की रोशनी पर आई। उन्होंने बताया कि आठवीं कक्षा में उनकी एक आँख में संक्रमण हुआ था। उस आँख की रोशनी धीरे-धीरे कम हुई और फिर समस्या दूसरी आँख में भी फैल गई। अभी जिस जीवन का उन्होंने अनुभव किया था, उसमें घायल व्यक्ति ने भी पहले एक आँख और फिर दूसरी आँख की रोशनी खोई थी। दोनों अनुभवों की यह समानता उन्हें गहराई से छू गई।

फिर उनका ध्यान कर्ज़ पर गया। लड़की को खेत के मालिक से नफ़रत नहीं थी। वह उसे नुकसान नहीं पहुँचाना चाहती थी। लेकिन पिता के बकाया कर्ज़ ने परिवार को साहूकार के सामने असहाय बना दिया था और उसने उसी मजबूरी का इस्तेमाल करके लड़की से एक निर्दोष आदमी पर गोली चलवा दी। क्लाइंट को अपने वर्तमान जीवन के डर की जड़ इस हिस्से में दिखाई दी। अब उन्हें समझ आने लगा कि थोड़े-से पैसे या किसी अधूरे एहसान का बकाया होना भी इतना भयावह क्यों लगता था: हिसाब बाकी रहने तक सामने वाला उनसे क्या माँग सकता है?

उन्होंने यह भी बताया कि सरकारी अधिकारी बनने के बाद यह डर और बढ़ गया था। उनके पद पर लिया गया एक निर्णय या किया गया एक हस्ताक्षर बहुत-से लोगों के जीवन को प्रभावित कर सकता था। आज का छोटा-सा व्यक्तिगत एहसान कल ऐसी अपेक्षा बन सकता था कि वे अपने काम में किसी के लिए विशेष निर्णय लें। वे ऐसा दबाव नहीं चाहते थे। वे नहीं चाहते थे कि उनकी ईमानदारी से समझौता हो या उनके फैसले से किसी और को नुकसान पहुँचे। व्यक्तिगत कर्ज़ और एहसान से दूर रहना उनके लिए अपने निर्णयों की स्वतंत्रता बचाए रखने का एक तरीका था।

उसी अवस्था में उन्हें एक और पहचान महसूस हुई। उन्हें लगा कि जिस खेत के मालिक को लड़की ने गोली मारी थी, उसकी आत्मा उनके वर्तमान जीवन में एक करीबी मित्र के रूप में है, जो अब नोएडा में रहते हैं। यह पहचान उनके पास्ट लाइफ रिग्रेशन अनुभव का हिस्सा थी। इन विचारों के साथ वे अभी भी ट्रान्स में थे और सत्र दूसरे जीवन की ओर बढ़ा।

जब तक गोलियाँ खत्म नहीं हुईं, तब तक गोलियाँ चलती रहीं।

क्लाइंट अभी भी ट्रान्स में थे जब एक और जीवन सामने आने लगा। इस बार उन्होंने स्वयं को सन 1919 में दिल्ली के पास एक गाँव में रहने वाले लगभग चालीस वर्षीय व्यक्ति के रूप में अनुभव किया। उनके पास करीब 150 बीघा ज़मीन थी और डेयरी का सफल व्यवसाय था। घर में पत्नी और दो बेटियाँ थीं। परिवार, काम और उन पर निर्भर लोग ही उनके जीवन का केंद्र थे।

उस अप्रैल उनकी दोनों बेटियाँ अमृतसर में अपने चाचा के परिवार के यहाँ गई हुई थीं। बैसाखी का समय था परिवारों के मिलने और उत्सव मनाने का अवसर। वहाँ रहते हुए लड़कियाँ अपने चाचा, चाची और चचेरे भाई-बहनों के साथ जलियांवाला बाग गईं। उनके पिता दिल्ली के पास अपने घर पर थे। उन्हें उम्मीद थी कि कुछ दिनों बाद बेटियाँ लौट आएँगी।

13 अप्रैल को जलियांवाला बाग में हज़ारों लोग जमा हुए थे। क्लाइंट जिस जीवन का अनुभव कर रहे थे, उसकी दोनों बेटियाँ भी अपने चाचा, चाची और उनके बच्चों के साथ वहीं थीं। कुछ लोग बैसाखी के लिए आए थे और कुछ अंग्रेज़ी हुकूमत की नीतियों तथा भारतीय नेताओं की गिरफ़्तारी के विरोध में अपनी बात रखने आए थे। सभा शांतिपूर्ण थी; लोगों के पास हथियार नहीं थे।

तभी जनरल रेजिनाल्ड डायर की कमान में ब्रिटिश सैनिक वहाँ पहुँचे। बाग चारों ओर से घिरा था और उससे निकलने के रास्ते सँकरे थे। डायर अपने साथ मशीनगनों से लैस बख्तरबंद गाड़ियाँ लाया था, लेकिन वे बाग तक पहुँचने वाले सँकरे रास्ते से अंदर नहीं जा सकीं। उसके सैनिक प्रवेश मार्ग पर तैनात हो गए। लोगों को वहाँ से हटने की कोई चेतावनी नहीं दी गई। डायर ने गोली चलाने का आदेश दे दिया।

निहत्थे लोग गोलियों से बचने के लिए भागे। कुछ वहीं गिर पड़े। कुछ सँकरे रास्तों की ओर दौड़े, जबकि कुछ बचने की उम्मीद में कुएँ में कूद गए। सैनिक भीड़ पर गोलियाँ चलाते रहे। गोलीबारी तभी रुकी जब उनके पास गोलियाँ पूरी तरह खत्म हो गईं। मृतकों की संख्या पर अलग-अलग दावे रहे हैं, लेकिन कोई संख्या उन परिवारों के नुकसान को समेट नहीं सकती जो अपनों के लौटने की राह देखते रह गए।

जलियांवाला बाग आज भी भारत की स्मृति में गहरा घाव है। उस समय पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ’ड्वायर ने डायर की कार्रवाई का समर्थन किया था। वर्षों बाद, 1940 में, शहीद ऊधम सिंह ने लंदन में ओ’ड्वायर को गोली मारी। लेकिन क्लाइंट जिस व्यक्ति के जीवन का अनुभव कर रहे थे, उसके लिए यह सिर्फ़ इतिहास की घटना नहीं थी। उस अनुभव में उसकी दोनों बेटियाँ, उसका भाई, भाभी और उनके साथ गए बच्चे मारे गए थे।

वह स्वयं जलियांवाला बाग में नहीं था। अपनी बेटियों के साथ वहाँ हर पल क्या हुआ होगा, यह वह नहीं जान सकता था। वह इतना जानता था कि वे रिश्तेदारों से मिलने गई थीं और अब कभी घर नहीं लौटेंगी। उस घटना ने उसके घर से उसकी बेटियों के साथ उस भाई का परिवार भी छीन लिया जिसने उनका स्वागत किया था।

शोक के बीच एक सवाल उसे लगातार घेरने लगा: वह इसके जवाब में क्या कर सकता है? घर और परिवार में अभी भी ऐसे लोग थे जो उस पर निर्भर थे। सब कुछ छोड़कर हथियार उठाना उसके लिए संभव नहीं था। लेकिन अपनी समृद्ध ज़िंदगी पहले की तरह जीते रहना भी संभव नहीं था, जैसे यह सब किसी और के साथ हुआ हो। उसने अपनी परिस्थितियों में रहकर भारत की आज़ादी की लड़ाई का साथ देने का संकल्प लिया।

उसने क्रांति की लौ को जलाए रखा

सेवा और योगदान का सांकेतिक चित्र
कहानी से प्रेरित सांकेतिक चित्र; ऐतिहासिक प्रमाण नहीं।

जलियांवाला बाग में बेटियों और भाई के परिवार को खोने के बाद वह अपनी समृद्धि को पहले की नज़र से नहीं देख पा रहा था। घर में उसकी पत्नी थी और दूसरे लोग भी उस पर निर्भर थे। वह उन्हें छोड़कर सीधे हथियार नहीं उठा सकता था। लेकिन उसने मन ही मन संकल्प कर लिया: उसकी ज़मीन, उसकी कमाई और उसकी डेयरियों से बनने वाला भोजन भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वालों के काम आएगा।

यह लड़ाई केवल मैदान में ही असमान नहीं थी। अंग्रेज़ी हुकूमत के पास पुलिस थी, हथियार थे, धन था और मुखबिर थे। क्रांतिकारियों को संभलकर चलना पड़ता था, अपने ठिकाने छिपाने पड़ते थे और ऐसे लोगों को तलाशना पड़ता था जो खतरा उठाकर उनकी मदद करें। रात में रुकने की एक सुरक्षित जगह या अगले दिन का भोजन भी पैसों जितना महत्वपूर्ण हो सकता था। उस ज़मींदार के पास ये तीनों उपलब्ध कराने के साधन थे।

पास्ट लाइफ रिग्रेशन में उभरे दृश्यों में उसकी ज़मीन ऐसे लोगों के लिए आश्रय बन गई जो अधिकारियों की नज़र से बचना चाहते थे। वह उनकी आवश्यकताओं के लिए धन देता था, जिसमें अन्य सामान और हथियारों की व्यवस्था भी शामिल थी। उसकी डेयरियों से उन्हें दूध, दही, घी और मक्खन बिना पैसे लिए पहुँचाया जाता था। उसने अपना व्यवसाय परिवार के लिए खड़ा किया था; अब वही व्यवसाय देश के लिए जोखिम उठाने वालों को भी सहारा दे रहा था।

उस जीवन के अगले वर्षों के दृश्य सामने आए तो क्लाइंट ने ग़दर पार्टी से जुड़े लोगों और बाद में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन, यानी एचएसआरए, से जुड़े क्रांतिकारियों के साथ संबंध अनुभव किए। भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद से जुड़े दृश्य भी उन्हें दिखाई दिए। ये मुलाक़ातें उनके पास्ट लाइफ रिग्रेशन अनुभव में सामने आई थीं।

एक दृश्य में विशेष अपनापन था। ज़मींदार ने स्वयं को भगत सिंह को गले लगाते और उनका तथा उनके साथियों का स्वागत करते देखा। उसने उन्हें भरोसा दिलाया कि ज़रूरत पड़ने पर वे उसकी ज़मीन पर आकर रह सकते हैं। जब उसकी बेटियाँ घर नहीं लौटी थीं, तब वह कुछ नहीं कर सका था। अब वह उन दूसरे युवाओं को जितना संभव हो, सुरक्षित जगह देना चाहता था जो स्वतंत्र भारत के लिए लड़ रहे थे।

दूसरे दृश्यों में भी क्रांतिकारी उसकी ज़मीन पर शरण लेते और उसकी डेयरियों से सहायता पाते दिखाई दिए। इस योगदान से उसे सार्वजनिक पहचान नहीं मिली। उसने इसी तरह सेवा करने का रास्ता चुना था: चुपचाप, घर में अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए।

आज स्वयं सरकारी अधिकारी के पद पर कार्यरत क्लाइंट के लिए इस जीवन का एक और अर्थ था। उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति का जीवन अनुभव किया था जिसने अपने धन और प्रभाव को देश की सेवा में लगाया। वर्तमान जीवन में उनकी अपनी जिम्मेदारी का स्वरूप अलग था। यह समानता उन्हें सोचने पर मजबूर करती थी: किसी व्यक्ति ने कौन-सा पद पाया, इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उस पद और अपनी सामर्थ्य का इस्तेमाल वह किसलिए करता है।

उन दो जन्मों से उन्हें क्या समझ आया

पहले जीवन ने उन्हें बचपन से चले आ रहे डर के करीब पहुँचाया। लड़की खेत के मालिक को गोली मारना नहीं चाहती थी। लेकिन पिता के कर्ज़ ने साहूकार को उसके परिवार पर अधिकार दे दिया और उसने उसी का इस्तेमाल करके लड़की से एक निर्दोष व्यक्ति को नुकसान पहुँचवाया। साहूकार ने हिसाब बंद मान लिया था, पर लड़की ने अपना शेष जीवन उस व्यक्ति की पीड़ा देखते हुए बिताया। क्लाइंट के लिए कर्ज़ का सबसे डरावना पक्ष यही था: एक अधूरा हिसाब किसी को ऐसी माँग के सामने असहाय बना सकता है जिसे पूरा करने का विचार ही असहनीय हो।

वे समझ पाए कि सरकारी अधिकारी बनने के बाद यह भय और क्यों बढ़ा था। अब उनके निर्णयों का असर दूसरे लोगों पर पड़ता था। वे नहीं चाहते थे कि कोई व्यक्तिगत एहसान या बकाया उनके निर्णय को प्रभावित करे। जो भावना लंबे समय तक बिना कारण का डर लगती थी, उसमें उनकी एक गहरी मान्यता भी दिखाई दी: ईमानदारी से और बिना किसी दबाव के काम करने की स्वतंत्रता।

घायल ज़मींदार की आँखों की रोशनी जाने और आठवीं कक्षा में अपनी आँखों की रोशनी जाने के अनुभवों की समानता भी उनके मन में बनी रही। पास्ट लाइफ रिग्रेशन में उस व्यक्ति ने पहले एक और फिर दूसरी आँख की रोशनी खोई थी। क्लाइंट के साथ भी संक्रमण के बाद ऐसा ही हुआ था। इस समानता में उन्हें व्यक्तिगत अर्थ दिखाई दिया। लेकिन बचपन से अब तक का उनका जीवन केवल आँखों की रोशनी खोने की कहानी नहीं था; उसमें पढ़ाई, परिश्रम और सेवा भी थी।

दूसरे जीवन ने उनके सामने एक और विचार रखा। जलियांवाला बाग में बेटियों और रिश्तेदारों को खोने वाला व्यक्ति बीता हुआ समय बदल नहीं सकता था। उसने अपनी ज़मीन, डेयरियों और धन से उन लोगों को आश्रय और भोजन देने का निर्णय लिया जो भारत की आज़ादी के लिए काम कर रहे थे। वर्तमान जीवन में स्वयं जनसेवा करने वाले क्लाइंट के लिए यह संबंध बहुत अर्थपूर्ण था। वे सोच रहे थे कि क्या उस पहले की गई सेवा का इस जीवन में मिली क्षमताओं, अवसरों और आंतरिक शक्ति से कोई आध्यात्मिक संबंध हो सकता है।

वे एक डर का कारण तलाशने आए थे। पास्ट लाइफ रिग्रेशन सत्र के बाद उनके सामने दो चुनावों का महत्व अधिक स्पष्ट था: ऐसे बकाया से मुक्त रहना जो उनकी ईमानदारी पर दबाव डाल सकते हैं, और अपने पास जो कुछ है उसे दूसरों की भलाई में लगाना। उनकी शारीरिक दृष्टि जा चुकी थी, लेकिन शिक्षा, सेवा, योग और ध्यान के सहारे वे उस आंतरिक दृष्टि को विकसित करते रहे जिसे अपना तीसरा नेत्र कहते हैं। पिछले जन्मों के अनुभवों ने उनके लिए वर्तमान के निर्णय नहीं लिए; उन्होंने यह समझने में मदद की कि वे निर्णय इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं।

ध्यान सीखना: परिस्थितियों से आगे की आंतरिक शक्ति

क्लाइंट एक ऐसे डर को समझने आए थे जो उन्हें लंबे समय से परेशान करता था। साथ ही वे अपने साथ वर्षों से विकसित किया हुआ आध्यात्मिक अभ्यास भी लाए थे। आँखों की रोशनी जाने के बाद भी उन्होंने योग और ध्यान जारी रखा और उस आंतरिक दृष्टि को विकसित किया जिसे वे तीसरा नेत्र कहते हैं। उनकी कहानी यह नहीं कहती कि ध्यान से जीवन की हर कठिनाई दूर हो गई। यह दिखाती है कि आध्यात्मिक अभ्यास ने उन्हें शक्ति, उद्देश्य और स्वयं को गहराई से समझने की इच्छा के साथ जीवन का सामना करने में मदद की।

हम अपने सामने आने वाली हर परिस्थिति नहीं चुन सकते। लेकिन अपने विचारों को समझने, मन की स्थिति का ध्यान रखने और धीरे-धीरे अधिक स्थिरता से आगे बढ़ने के लिए समय निकाल सकते हैं। ध्यान ऐसा ही एक अभ्यास है, जिसे रोज़ थोड़ा-थोड़ा सीखा जा सकता है।

यदि आप शुरुआत करना चाहते हैं, तो हमारी टीम पूरी तरह निःशुल्क मार्गदर्शित ध्यान पाठ्यक्रम उपलब्ध कराती है। आप हमारे निःशुल्क ध्यान सीखने वाले समूह से जुड़ने का अनुरोध कर सकते हैं और रोज़मर्रा के जीवन में अधिक जागरूकता तथा आध्यात्मिक स्थिरता लाना सीख सकते हैं।

पाठकों के लिए एक ज़रूरी बात

एक मनोवैज्ञानिक और पास्ट लाइफ रिग्रेशन विशेषज्ञ के रूप में मेरा मानना है कि किसी व्यक्ति को सत्र में मिले व्यक्तिगत अर्थ और उसके वर्तमान जीवन के बारे में प्रमाणित रूप से कही जा सकने वाली बात में अंतर करना बहुत ज़रूरी है।

इस मामले में क्लाइंट को पिछले जन्म के एक अनुभव में वर्णित आँखों की रोशनी जाने और बचपन में अपनी आँखों की रोशनी जाने के बीच समानता महसूस हुई। यह समानता उनके लिए अर्थपूर्ण थी। इसे इस बात का प्रमाण नहीं समझना चाहिए कि पिछले जन्म के किसी कर्म से उनकी आँखों की रोशनी गई, या दृष्टिबाधा किसी प्रकार का दंड है। उनके स्वास्थ्य का इतिहास अपनी जगह समझे जाने और उचित देखभाल पाने का विषय है।

दूसरे जीवन के अनुभव ने उन्हें सेवा, आध्यात्मिक विकास और अपने बनाए हुए जीवन पर विचार करने का अवसर दिया। इसका अर्थ यह नहीं कि उनकी क्षमताओं या उपलब्धियों को किसी एक पिछले कर्म का परिणाम घोषित कर दिया जाए। इस जीवन में उनका प्रयास, शिक्षा और उनके अपने निर्णय भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

पास्ट लाइफ रिग्रेशन के अनुभव व्यक्तिपरक होते हैं। सत्र में दिखाई देने वाले लोगों और घटनाओं को, जिनमें वर्तमान जीवन के किसी परिचित व्यक्ति की पहचान महसूस होना भी शामिल है, स्वतंत्र रूप से सत्यापित तथ्य नहीं मानना चाहिए। पास्ट लाइफ रिग्रेशन उचित चिकित्सा या मनोवैज्ञानिक देखभाल का विकल्प भी नहीं है।

इस क्लाइंट को सत्र से बचपन से चले आ रहे अपने एक डर को समझने में स्पष्टता मिली। उस समझ का मूल्य इस बात में है कि वे अब अधिक जागरूकता के साथ जी सकें, सोच-समझकर चुनाव कर सकें और उस पुराने डर को अधिक स्पष्ट रूप से समझकर उसका सामना कर सकें।

पास्ट लाइफ रिग्रेशन विशेषज्ञ
एवं मनोवैज्ञानिक

पास्ट लाइफ रिग्रेशन, हीलिंग अवं आध्यात्मिक मार्गदर्शन के माध्यम से व्यक्तियों के जीवन में बार-बार दोहराने वाले भावनात्मक, संबंधों और परिस्थितियों के पैटर्न को समझने में सहायता करते हैं।

चिंतन करें, समझें और आगे बढ़ें

हर प्रश्न खोलकर इस कहानी और इससे निकलने वाली व्यापक सीख पर विचार करें।

इतनी उपलब्धियों के बावजूद क्लाइंट पास्ट लाइफ रिग्रेशन सत्र में क्यों आए?

उन्होंने अपना करियर बनाया था, कई देशों की यात्रा की थी और नियमित आध्यात्मिक अभ्यास विकसित किया था। फिर भी बचपन से मामूली कर्ज़ या लौटाया न गया एहसान भी उन्हें डराता था। वे समझना चाहते थे कि किसी का कुछ बकाया होना इतना भयावह क्यों लगता है, जबकि जीवन के दूसरे क्षेत्रों में उन्होंने इतना आत्मविश्वास पाया था।

उसके पिता पर एक साहूकार का कर्ज़ था, जिसका खेत के मालिक से भी विवाद था। साहूकार ने वादा किया कि यदि लड़की उसे गोली मार दे, तो परिवार का कर्ज़ माफ़ कर देगा। पिता की तकलीफ़ देखकर लड़की खुद को मजबूर महसूस कर रही थी। उसने दूर से गोली चलाई, इस उम्मीद से कि आदमी बच जाएगा। वह उसे नुकसान नहीं पहुँचाना चाहती थी, लेकिन उसके हाथों नुकसान हुआ।

जब वह उसके घर गई, तो उसने अपनी चलाई गोली के परिणाम देखे। वह सच बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाई और न उसकी आँखों की रोशनी वापस ला सकती थी। उसकी सेवा करना अपने किए की जिम्मेदारी उठाने का उसका तरीका बन गया। यह देखभाल महत्वपूर्ण थी, लेकिन इससे पहले हुआ नुकसान मिट नहीं सकता था।

पास्ट लाइफ रिग्रेशन के अनुभव में खेत के मालिक की आँख के पास लगी चोट में संक्रमण हुआ और धीरे-धीरे दोनों आँखों की रोशनी चली गई। क्लाइंट ने बताया कि आठवीं कक्षा में पहले उनकी एक आँख में संक्रमण हुआ और बाद में दूसरी आँख भी प्रभावित हुई। यह समानता उनके लिए अर्थपूर्ण थी; इससे उनकी आँखों की रोशनी जाने का चिकित्सकीय कारण सिद्ध नहीं होता।

उनके पद पर लिया गया निर्णय या किया गया हस्ताक्षर बहुत लोगों को प्रभावित कर सकता था। वे चिंतित थे कि आज लिया गया कोई व्यक्तिगत एहसान कल उनके अधिकार का इस्तेमाल किसी और के पक्ष में करने की अपेक्षा बन सकता है। वे अपने विवेक और ईमानदारी के अनुसार निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र रहना चाहते थे।

जिस जीवन का उन्होंने अनुभव किया, उसमें उस व्यक्ति की दोनों बेटियाँ और कई रिश्तेदार जलियांवाला बाग में मारे गए थे। उसके घर में अब भी लोग उस पर निर्भर थे, इसलिए उसने अपनी उपलब्ध संपत्ति से मदद करने का फैसला किया। उसकी ज़मीन ने आश्रय दिया, उसकी कमाई ने ज़रूरतें पूरी कीं और उसकी डेयरियों ने क्रांतिकारियों को भोजन पहुँचाया।

उन्होंने क्रांतिकारियों को उस ज़मींदार की ज़मीन पर आश्रय लेते देखा। एक दृश्य में वह भगत सिंह को गले लगाकर स्वागत कर रहा था और उन्हें तथा उनके साथियों को ज़रूरत पड़ने पर वहाँ रुकने के लिए कह रहा था। उन्होंने ग़दर पार्टी और एचएसआरए से जुड़े लोगों के दृश्य भी अनुभव किए। ये पास्ट लाइफ रिग्रेशन सत्र में आए अनुभव थे, स्वतंत्र रूप से प्रमाणित ऐतिहासिक मुलाक़ातें नहीं।

नहीं। लड़की की जीवन भर की सेवा उस व्यक्ति की आँखों की रोशनी वापस नहीं ला सकी। कहानी जिम्मेदारी उठाने का महत्व दिखाती है, लेकिन यह भी कि कुछ परिणाम पलटे नहीं जा सकते। क्लाइंट के लिए एक और गहरी सीख यह थी कि परिवार के कर्ज़ ने लड़की को ऐसे हालात में पहुँचा दिया जहाँ किसी दूसरे ने उसके फैसलों पर अधिकार जमा लिया।

नहीं। क्लाइंट को आँखों की रोशनी जाने के दो अनुभवों में व्यक्तिगत समानता दिखाई दी, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि पिछले जन्म के किसी कर्म से उनकी आँखों की रोशनी गई। दृष्टिबाधा किसी व्यक्ति के मूल्य को नहीं मापती और न उसके दुःख का औचित्य बताती है। उनके स्वास्थ्य का इतिहास और इस जीवन की उपलब्धियाँ अपनी जगह समझी जानी चाहिए।

आँखों की रोशनी जाने के बाद उन्होंने योग और ध्यान का अभ्यास किया और उस जागरूकता को विकसित किया जिसे वे अपना तीसरा नेत्र कहते हैं। उनके लिए यह भीतर की समझ और आत्मविश्वास का स्रोत बना। आध्यात्मिक अभ्यास ने कर्ज़ के डर सहित जीवन की हर कठिनाई को नहीं मिटाया; लेकिन उन्हें सीखते रहने, दूसरों की सेवा करने और वर्तमान जीवन में जागरूक चुनाव करने की शक्ति दी।

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