सच्ची पास्ट लाइफ की कहानी
लौटने का वादा, अधूरा इंतज़ार: विवाह और झूठी आशा की पास्ट लाइफ रिग्रेशन कहानी
लेखक: हितेश छाबड़ा • पास्ट लाइफ रिग्रेशन विशेषज्ञ एवं मनोवैज्ञानिक
अनुमानित पढ़ने का समय 15 मिनट • अक्टूबर 2026
सब कुछ सँभला हुआ था, बस विवाह का प्रश्न अधूरा था
ज़रा सोचिए, दूसरे लोग अपने आर्थिक भविष्य के लिए आप पर भरोसा करते हों। आप उनके निवेश समझती हों, बड़े निर्णय लेती हों, जिम्मेदारी के साथ अपना कारोबार चलाती हों। लेकिन जब बात अपने व्यक्तिगत जीवन की आए, तो एक ही प्रश्न बार-बार मन के सामने खड़ा हो जाए: मेरे साथ रिश्ता आगे क्यों नहीं बढ़ता?
पास्ट लाइफ रिग्रेशन की यह कहानी ऐसी ही एक बहन की है। उन्होंने कॉमर्स में पोस्टग्रेजुएशन किया था और अपनी वित्तीय तथा निवेश संबंधी कंपनी चलाती थीं। लोगों के करोड़ों रुपये के निवेश की जिम्मेदारी सँभालना उनके काम का हिस्सा था। इतनी सफलता के बाद भी उनके व्यवहार में बहुत सरलता और विनम्रता थी।
लेकिन लगभग आठ वर्षों से विवाह के विषय में परेशानियाँ बनी हुई थीं। किसी से पंद्रह दिन बात होती, किसी से एक महीना, किसी से डेढ़ या दो महीने। फिर सामने वाला पीछे हट जाता। बात वहीं रुक जाती।
बार-बार ऐसा होते हुए एक समय पर उनका मन स्वयं से पूछने लगा: कहीं कमी मुझमें ही तो नहीं है? सत्र की शुरुआत किसी पुराने जन्म से नहीं, इसी वर्तमान पीड़ा को समझने से हुई।
जब हर अस्वीकृति अपने मूल्य पर सवाल बन जाए
एक रिश्ता आगे न बढ़े तो दुख होता है। लेकिन जब ऐसा बार-बार हो, तो मन हर घटना को अलग नहीं रख पाता। वह पिछली सभी अस्वीकृतियों को एक साथ जोड़ने लगता है। फिर किसी एक व्यक्ति का निर्णय, अपने पूरे व्यक्तित्व पर लगा हुआ निर्णय लगने लगता है।
वीडियो में मैंने उनसे लोगों की “फ्रीक्वेंसी” मिलने की बात की थी। यह बात आपसी अनुकूलता समझाने के लिए थी। दो लोग विवाह चाहते हों, तब भी रिश्ते से उनकी अपेक्षाएँ, जिम्मेदारी निभाने की तैयारी और जीवन को देखने का तरीका अलग हो सकता है। किसी से तालमेल न बैठना अपने मूल्य का प्रमाण नहीं है।
एक सामान्य उदाहरण लीजिए। दो लोग कहते हैं कि उन्हें साथ चाहिए। एक के लिए साथ का अर्थ है जिम्मेदारियाँ बाँटना और खुलकर बात करना। दूसरे के लिए उसका अर्थ केवल इतना हो सकता है कि कोई उसके आसपास रहे, लेकिन निर्णय सारे उसी के हों। शब्द एक है, उसके भीतर छिपी अपेक्षा अलग है। यह समझाने का उदाहरण है, बहन की कहानी की कोई अतिरिक्त घटना नहीं।
मैं नहीं चाहता था कि अकेले रह जाने का डर उन्हें जल्दबाजी में कोई रिश्ता स्वीकार करने की ओर धकेल दे। लेकिन आगे बातचीत में पता चला कि इस प्रश्न के पीछे एक पुराना विवाह भी था।
तेईस वर्ष की उम्र में मिला एक रिश्ता
लगभग तेईस वर्ष की उम्र में उनकी मुलाकात अमेरिका में रहने वाले भारतीय मूल के एक युवक से हुई थी। युवक काम के सिलसिले में भारत आया हुआ था। दोनों एक वैवाहिक वेबसाइट के माध्यम से मिले और बातचीत शुरू हुई।
बात इतनी जल्दी आगे बढ़ी कि लगभग एक सप्ताह के भीतर रोका हो गया। परिवारों की ओर से इस रिश्ते को आगे बढ़ाने की सहमति मिल चुकी थी। इसके बाद युवक वापस अमेरिका चला गया।
लगभग तीन-चार महीने बाद वह अपने परिवार के साथ दोबारा भारत आया। इस बार दोनों का कोर्ट मैरिज हुआ।
अब यह केवल किसी वेबसाइट पर चल रही बातचीत नहीं थी। विवाह हो चुका था। परिवार शामिल हो चुके थे। कानूनी रूप से संबंध जुड़ चुका था। बहन के लिए यह मानना स्वाभाविक था कि अब दोनों मिलकर अपना घर बसाएँगे।
कभी-कभी भविष्य का घर बनने से पहले ही मन उसमें रहने लगता है। साथ की कल्पना, आगे की योजनाएँ और जीवन की छोटी-छोटी उम्मीदें भीतर अपना स्थान बना लेती हैं।
वह वापस अमेरिका गया, लेकिन उन्हें लेने नहीं आया
विवाह के बाद युवक ने कहा कि जरूरी काम के कारण उसे अमेरिका लौटना होगा। बहन भारत में रहीं। उन्हें उम्मीद थी कि वह लौटकर आएगा और उन्हें अपने साथ ले जाएगा।
शुरू में फोन पर प्रेम से बात होती रही। फिर धीरे-धीरे बोलने का तरीका बदलने लगा। बातों की मिठास में कड़वाहट आने लगी। एक समय उसने कह दिया कि वह वापस नहीं आएगा। इसके बाद बातचीत ही बंद हो गई।
पहले बहन को लगा कि शायद गुस्से में कह दिया होगा। कोई बात खराब लगी होगी। कुछ समय बाद मन शांत होगा तो फिर बात होगी। लेकिन समय गुजरता रहा और दूसरी ओर की खामोशी बनी रही।
व्यक्ति सामने नहीं होता, फिर भी उसकी प्रतीक्षा जीवन में मौजूद रहती है। बाहर से रोजमर्रा के काम चलते रहते हैं, लेकिन मन का एक हिस्सा उसी प्रश्न पर ठहरा रहता है: क्या अब वह लौटेगा?
विवाह हुआ, पर वैवाहिक घर में एक दिन भी नहीं बीता
कई महीने प्रतीक्षा करने के बाद उन्होंने स्वीकार किया कि पति लौटने वाला नहीं है। आखिरकार उन्होंने तलाक की प्रक्रिया शुरू की। उनके बताए अनुसार अदालत के समन का भी जवाब नहीं आया और लगभग डेढ़ वर्ष बाद तलाक मिल गया।
उनके दुख का एक पहलू बहुत अलग था। वह पति के साथ अपने वैवाहिक घर में एक दिन भी नहीं रही थीं। जिस रोजमर्रा के साथ से दांपत्य जीवन शुरू होता है, वह शुरुआत ही नहीं हुई थी। फिर भी समाज की दृष्टि में उनके साथ तलाकशुदा होने की पहचान जुड़ गई।
वीडियो में मैंने समझाया था कि कुछ महिलाएँ विवाह के बाद कुछ महीने पति के घर रहती हैं और फिर संबंध टूटने पर वापस आती हैं। वह परिस्थिति भी दुखद होती है। लेकिन यहाँ बहन तो उस साझा घर में पहुँची ही नहीं थीं, जिसके सपने लेकर उन्होंने विवाह किया था।
बाद के रिश्ते जब पीछे हटते, तो यह पुराना दुख फिर जाग जाता। कहानी में बताए गए आठ वर्ष विवाह संबंधी व्यापक परेशानी का समय हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने उसी पति के लिए आठ वर्ष प्रतीक्षा करने के बाद तलाक लिया था।
पास्ट लाइफ रिग्रेशन में बाजार का दृश्य
पास्ट लाइफ रिग्रेशन शुरू होने पर उनके सामने एक बिल्कुल अलग दृश्य आया। उन्होंने स्वयं को लगभग पैंतीस से चालीस वर्ष के एक गरीब पुरुष के रूप में अनुभव किया। वह नंगे पैर बाजार में घूम रहा था। उसके कपड़े पुराने और फटे हुए थे, ऊपर कुर्ते जैसी कमीज और नीचे पजामा था। बाजार के आगे एक बड़ा राजमहल दिखाई देता था।
वह काम ढूँढ़ रहा था। एक दुकान पर जाता, फिर दूसरी पर। कहीं कोई काम मिल जाए, किसी प्रकार घर चलाने का साधन बन जाए। लेकिन दिन बीत गया और काम नहीं मिला।
वर्तमान जीवन में वह एक सफल व्यवसाय सँभालने वाली महिला थीं। इस दृश्य में वह ऐसा पुरुष थीं जिसे दिन भर में काम तक नहीं मिला। फिर भी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण भाव बाजार में नहीं, घर लौटने के प्रश्न पर सामने आया।
जब मैंने उसे घर जाने के लिए कहा, तो उसका मन घर लौटने को तैयार नहीं था।
पत्नी की आँखों में काम मिलने की आशा थी
आखिरकार वह एक छोटी-सी झोपड़ी में पहुँचा। पत्नी खाना बना रही थी। पास में दो बेटे खेल रहे थे, जिनकी उम्र लगभग तीन और छह वर्ष थी। पत्नी उसकी ओर इस उम्मीद से देख रही थी कि शायद आज कोई काम मिल गया होगा।
घर में कोई बड़ी माँग नहीं थी। एक साधारण परिवार था, उसकी रोज की जरूरतें थीं। लेकिन उस पुरुष को पत्नी और बच्चे जिम्मेदारी से अधिक बोझ लग रहे थे। वह इन सबसे निकल जाना चाहता था।
उसने बताया कि वह विवाह करना ही नहीं चाहता था। उसे अपनी गरीबी का पता था। लगता था कि परिवार कैसे चला पाएगा। लेकिन गाँव में परिवार के दबाव में विवाह हुआ। बाद में काम की आशा लेकर वह राजधानी आया, मगर यहाँ भी बात नहीं बनी।
गरीबी का दबाव समझ में आता है। लेकिन उसी कठिनाई में पत्नी और बच्चे भी जी रहे थे। वह अकेला परेशान नहीं था। फिर भी उसका मन ऐसे सोच रहा था मानो परिवार को छोड़ देने से पूरी समस्या पीछे छूट जाएगी।
बस एक वादा करके वह चला गया
मैंने उससे पूछा कि अगर वह चला गया, तो पत्नी और बच्चों का क्या होगा। वे कैसे रहेंगे? उनका खाना, उनकी जरूरतें, उनका सहारा कौन बनेगा?
उस समय उसके भीतर अपने निकल जाने की इच्छा अधिक थी। पीछे रहने वालों का जीवन उसके विचार में उतना महत्वपूर्ण नहीं था।
उसने पत्नी से कहा कि वह शहर के बाहर जाकर काम ढूँढ़ेगा। वहाँ अपना प्रबंध कर लेगा। फिर वापस आकर पत्नी और बच्चों को भी साथ ले जाएगा।
वह चला गया। जहाँ जो थोड़ा-बहुत काम मिला, उससे अपना जीवन चलाता रहा। लेकिन परिवार को लेने कभी नहीं लौटा। यह जानने भी नहीं गया कि पत्नी और दोनों बच्चे किस स्थिति में हैं।
कहानी में अब दो प्रतीक्षाएँ एक-दूसरे के सामने दिखाई दे रही थीं। वर्तमान जीवन में बहन पति के विदेश से लौटने की प्रतीक्षा कर रही थीं। उस दृश्य में पत्नी उस पुरुष की प्रतीक्षा में रह गई थी जिसने लौटकर आने का वादा किया था।
झोपड़ी में मिले लोग इस जीवन में कौन थे?
सत्र में आगे बढ़ते हुए बहन ने उस जन्म की पत्नी को पहचाना। उनके अनुभव में वही आत्मा वर्तमान जीवन का वह पति था जो अमेरिका चला गया और वापस नहीं लौटा।
दोनों बच्चों को भी उन्होंने पहचाना। वे वर्तमान पति के पिता और भाई थे। किस उम्र वाला बच्चा किस वर्तमान रिश्ते से जुड़ा था, यह विवरण मूल वर्णन में स्पष्ट नहीं है, इसलिए यहाँ उसे निश्चित नहीं बनाया गया है।
ये पहचानें सत्र के भीतर हुए उनके व्यक्तिगत अनुभव का हिस्सा थीं। स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य नहीं थीं। लेकिन बहन के लिए इनसे भावनात्मक समानता स्पष्ट होने लगी। आज वह प्रतीक्षा कर रही थीं। उस दृश्य में वह स्वयं प्रतीक्षा छोड़कर चले जाने वाली भूमिका में थीं।
इस अनुभव पर विचार करने का अर्थ आज के लोगों पर किसी पिछले जन्म का आरोप लगाना नहीं है। ध्यान उस जिम्मेदारी पर जाता है जो किसी के भरोसे के साथ हमारे पास आती है।
वृद्धावस्था आ गई, पर वह पीछे देखने नहीं लौटा
उस पुरुष का जीवन आगे बढ़ता रहा। वह अकेला रहा और लगभग सत्तर वर्ष की उम्र में एक साधारण झोपड़ी में स्वाभाविक मृत्यु हुई। कहानी में ऐसा कोई दृश्य नहीं आया जिसमें वह परिवार के पास लौटता हो या पत्नी और बच्चों के बारे में पता करता हो।
यह अनुपस्थिति भी बहुत कुछ कहती है। कभी हमें लगता है कि गलत निर्णय का परिणाम तुरंत किसी बड़ी घटना के रूप में सामने आएगा। यहाँ ऐसा नहीं दिखा। वह अपनी जिंदगी जीता रहा, और जिन लोगों को छोड़ गया था उनका जीवन उसके ध्यान से बाहर रहा।
किसी की खबर लेना बंद कर देने से हमारे निर्णय का प्रभाव समाप्त नहीं हो जाता। हमें पता न हो कि सामने वाले ने क्या सहा, तब भी उसने जो सहा वह अपने स्थान पर बना रहता है। सत्र में परिवार की यही अनदेखी पीड़ा समझ का हिस्सा बनने लगी।
मार्गदर्शन ने झूठी आशा की ओर ध्यान दिलाया
सत्र के आध्यात्मिक चरण में बहन ने अपने अनुभव में दिखाई दिए मार्गदर्शक से इस संबंध को समझने का प्रयास किया। उनका ध्यान उस पत्नी की कठिनाइयों और अकेलेपन की ओर गया जिसे पीछे छोड़ दिया गया था।
वीडियो में उस पत्नी के दुख को श्राप और कर्मबंधन की भाषा में समझाया गया है। यह रिग्रेशन में सामने आई आध्यात्मिक व्याख्या है। वर्तमान जीवन की घटनाओं का स्वतंत्र रूप से प्रमाणित कारण नहीं है।
मार्गदर्शन में विशेष जोर उस झूठी आशा पर था जो लौटने के वादे ने बनाई थी। पत्नी को लगा कि पति कहीं काम जुटा रहा है। किसी दिन लौटेगा। फिर उसे और बच्चों को साथ ले जाएगा। उसकी प्रतीक्षा ऐसे भविष्य से जुड़ी रही जिसे देने का इरादा पुरुष का था ही नहीं।
इसका अर्थ यह नहीं कि सच बताकर परिवार छोड़ देना उचित हो जाता। बात यह है कि झूठा भरोसा नुकसान की एक और परत बनाता है। साथ और सहारे के अलावा, सामने वाले से वह स्पष्टता भी छिन जाती है जिसके आधार पर वह आगे के निर्णय ले सकता था।
क्षमा का अनुभव हुआ, आगे की कहानी नहीं गढ़ी गई
मार्गदर्शन था कि वर्तमान जीवन में मिले दुख के लिए वह क्षमा करें और जिस पुराने व्यवहार को अपने अनुभव में पहचाना है उसके लिए क्षमा माँगें। सत्र में उन्होंने उन आत्माओं से भीतर संवाद किया, अपने व्यवहार पर पश्चाताप व्यक्त किया और क्षमा माँगी।
उन्होंने अनुभव किया कि वे संतुष्ट हैं और संबंध का कर्मबंधन समाप्त किया जा सकता है। सत्र के भीतर इसी प्रकार के आंतरिक समाधान का वर्णन किया गया है।
वीडियो यह नहीं बताता कि इसके बाद बहन का दोबारा विवाह हुआ, पूर्व पति लौट आया या जीवन की सभी परेशानियाँ दूर हो गईं। केवल कहानी को सुखद अंत देने के लिए हम ऐसी कोई बात नहीं जोड़ सकते।
यहाँ जिस बदलाव का वर्णन है, वह भीतर की समझ, क्षमा और मुक्त होने की अनुभूति है। पूर्वजन्मों के विषय में कोई भी विचार रखता हो, वर्तमान रिश्तों में ईमानदार होने की जिम्मेदारी फिर भी बनी रहती है।
किसी के लिए हमारा “जल्द” महीनों की प्रतीक्षा बन सकता है
एक सामान्य स्थिति की कल्पना कीजिए। कोई व्यक्ति मन में जान चुका है कि वह संबंध आगे नहीं बढ़ाना चाहता। फिर भी बार-बार कहता है कि जल्द सब ठीक हो जाएगा। शायद उसे लगता है कि अभी कठिन बातचीत टाल देना आसान है। लेकिन दूसरी ओर कोई अपने महत्वपूर्ण निर्णय रोक रहा है, दूसरी संभावनाओं से पीछे हट रहा है और उसी आश्वासन पर जीवन की योजना बना रहा है।
एक के लिए वह एक क्षण में कहा गया शब्द है। दूसरे के लिए वही शब्द महीनों की प्रतीक्षा बन सकता है।
यह कहानी की सीख को समझाने का उदाहरण है, बहन के जीवन की कोई अतिरिक्त घटना नहीं। परिवार, काम और सहायता के वादों में भी यही जिम्मेदारी दिखाई दे सकती है। परिस्थितियाँ बदलें तो क्या हम स्पष्ट बात करते हैं? कोई आश्वासन पूरा नहीं कर सकते तो क्या केवल उस क्षण को आसान बनाने के लिए उसे देने से बचते हैं?
वादा केवल हमारे मुँह से निकला हुआ वाक्य नहीं रहता। वह किसी दूसरे के जीवन की योजना का हिस्सा बन जाता है। इसलिए “मैं लौटकर आऊँगा” कहने से पहले उस भरोसे का वजन समझना जरूरी है।
इस कहानी से अपने लिए क्या देखें?
मेरे लिए इस पास्ट लाइफ रिग्रेशन कहानी का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न केवल यह नहीं है कि किसी को कितनी प्रतीक्षा करनी चाहिए। प्रश्न यह भी है कि अपने निर्णय लेते समय हम दूसरे व्यक्ति को क्या सँभालने के लिए छोड़ देते हैं।
क्या हम सचमुच निभाने की भावना से आशा दे रहे हैं? या अपने भीतर तय हो चुके उत्तर की जिम्मेदारी लेने से बच रहे हैं?
बहन अपने छोड़े जाने के दुख के साथ आई थीं। उनके अनुभव ने उन्हें एक मिलते-जुलते वादे की दूसरी भूमिका दिखाई। यह विचार हमें अपने दुख को छोटा करने के लिए नहीं, दूसरों के प्रति अपनी जिम्मेदारी देखने के लिए आमंत्रित करता है।
सच बोलना उस समय कठिन लग सकता है। झूठी आशा वही कठिनाई किसी और के भीतर बहुत अधिक समय तक जीवित रख सकती है।
इस अनुभव के बारे में एक बात
यह लेख हितेश छाबड़ा के मूल विघ्नहर्ता वीडियो पर आधारित है। वर्तमान जीवन की घटनाएँ बहन के बताए अनुभव हैं। पूर्वजन्म के दृश्य, आत्माओं की पहचान और आध्यात्मिक मार्गदर्शन व्यक्तिगत रिग्रेशन अनुभव हैं, स्वतंत्र रूप से सत्यापित इतिहास नहीं।
चित्र सांकेतिक हैं और वास्तविक क्लाइंट को नहीं दिखाते। कर्म की व्याख्या किसी को छोड़ देने को उचित नहीं बनाती और न यह बताती है कि किसी व्यक्ति को दुर्व्यवहार सहना ही चाहिए। बाद के विवाह या अन्य परिणाम का दावा यहाँ नहीं किया गया है।
पास्ट लाइफ रिग्रेशन विशेषज्ञ एवं मनोवैज्ञानिक
पास्ट लाइफ रिग्रेशन, हीलिंग एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शन के माध्यम से रिश्तों, भावनाओं और जीवन के दोहराते अनुभवों को समझने में सहायता।
चिंतन करें, समझें और आगे बढ़ें
प्रश्नों पर क्लिक करें और गहरे दृष्टिकोण तथा जीवन की व्यापक सीख को समझें।
बहन पास्ट लाइफ रिग्रेशन के लिए क्यों आई थीं?
वह विवाह के विषय में बार-बार आने वाली रुकावटों और उस पति के व्यवहार को समझना चाहती थीं जो कोर्ट मैरिज के बाद अमेरिका लौट गया और उन्हें लेने नहीं आया।
क्या उन्होंने उसी पति के लिए आठ वर्ष प्रतीक्षा की?
नहीं। आठ वर्ष विवाह संबंधी व्यापक परेशानी का समय है। मूल वर्णन में लगभग डेढ़ वर्ष बाद तलाक मिलने की बात है, आठ वर्ष प्रतीक्षा करने के बाद तलाक लेने की नहीं।
क्या वह पति के साथ वैवाहिक घर में रही थीं?
उनके अनुसार वह पति के साथ वैवाहिक घर में एक दिन भी नहीं रही थीं।
पूर्वजन्म के दृश्य में क्या सामने आया?
उन्होंने स्वयं को ऐसे गरीब पुरुष के रूप में अनुभव किया जो काम न मिलने से परेशान था और पत्नी तथा दो बेटों को बाद में लेने आने का वादा करके चला गया।
उस जन्म की पत्नी की पहचान किस रूप में हुई?
बहन ने पत्नी को वर्तमान पति और दोनों बच्चों को उसके पिता तथा भाई के रूप में पहचाना। ये सत्र के भीतर की व्यक्तिगत पहचानें थीं।
लौटने के वादे पर इतना जोर क्यों था?
उस वादे ने पत्नी को ऐसे भविष्य की आशा में प्रतीक्षा करते रखा जिसे देने का इरादा पुरुष का नहीं था। मार्गदर्शन ने इसी झूठे भरोसे के अतिरिक्त दुख पर ध्यान दिलाया।
क्या सच बताकर छोड़ देना उचित हो जाता?
नहीं। आशय यह है कि झूठा आश्वासन जिम्मेदारी छोड़ने के नुकसान को और बढ़ाता है। इससे छोड़ देने का मूल निर्णय उचित नहीं हो जाता।
क्या वीडियो में उनके दोबारा विवाह का उल्लेख है?
नहीं। सत्र में क्षमा माँगने, क्षमा करने और बंधन से मुक्त होने के अनुभव का वर्णन है। बाद का विवाह या कोई निश्चित परिणाम नहीं बताया गया।
क्या कर्म की बात दुख सहने वाले को दोष देती है?
ऐसा निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। आध्यात्मिक व्याख्या किसी के वर्तमान व्यवहार को उचित नहीं बनाती और दुर्व्यवहार सहने की बाध्यता भी नहीं बनाती।
अपने रिश्तों में कौन-सी बात अपनाई जा सकती है?
वादा ईमानदारी से करें, परिस्थितियाँ बदलने पर स्पष्ट बात करें और याद रखें कि हमारी दी हुई आशा पर कोई अपने जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय टिका सकता है।
अपनी यात्रा जारी रखें
व्यक्तिगत मार्गदर्शन प्राप्त करें
विघ्नहर्ता टीम के साथ वन-टू-वन पास्ट लाइफ़ रिग्रेशन, हीलिंग और कंसल्टेशन सेशन का अनुभव करें।
क्या आप ध्यान करना सीखना चाहते हैं?
निशुल्क ध्यान करना सीखें एवं अधिक शांति, आंतरिक शक्ति तथा ईश्वर के साथ गहरा जुड़ाव प्राप्त करने के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त करें।
पास्ट लाइफ रिग्रेशन विशेषज्ञ एवं मनोवैज्ञानिक
पास्ट लाइफ रिग्रेशन, हीलिंग एवं आध्यात्मिक मार्गदर्शन के माध्यम से रिश्तों, भावनाओं और जीवन के दोहराते अनुभवों को समझने में सहायता।
अन्य आध्यात्मिक लेख
असली पास्ट लाइफ स्टोरी देखें
कहानी को सुनना चाहेंगे? हितेश छाबड़ा का मूल पास्ट लाइफ रिग्रेशन वीडियो यहाँ देखें।